कलाम: अहमद नदीम क़ासमी
संगीतकार: गुलाम अली
स्वर: आशा भोसले
हैरतों के सिलसिले सोज़-ए-निहा तक आ गये
हम तो दिल तक चाहते थे तुम तो जाँ तक आ गये
ज़ुल्फ़ में ख़ुश्बू न थी या रंग आरिज़ में न था
आप किसकी जुस्तजू में गुलसिताँ तक आ गये
ख़ुद तुम्हें चाक-ए-गरेबाँ का शऊर आ जायेगा
तुम वहाँ तक आ तो जाओ हम जहाँ तक आ गये
उनकी पलकों पे सितारे अपने होंठों पे हँसी
क़िस्सा-ए-ग़म कहते कहते हम यहाँ तक आ गये
(प्रेषक: प्रणय वसावडा)

